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बचपन का स्वाद फिर आया याद,मराठी जत्रा में कढी कोंडुळे:वाटली दाल-उंबर हांडी का स्वाद ; होली, दिवाली और गणेश चतुर्थी के पारंपरिक पकवान




महाराष्ट्र के गांवों में बनने वाले पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद अब इंदौर में भी मिल रहा है। विजय नगर स्थित गुजराती समाज स्कूल परिसर में 23 से 25 अक्टूबर तक आयोजित 12वें ‘जत्रा मराठी वारसा फेस्टिवल’ में 50 से ज्यादा स्टॉल लगाए गए हैं। यहां महाराष्ट्र के अलग-अलग क्षेत्रों के पकवानों के बीच कढी कोंडुळे, वाटली दाल और उंबर हांडी खास आकर्षण बने हुए हैं। इन व्यंजनों की खासियत इन्हें बनाने का पारंपरिक तरीका और स्थानीय सामग्री है। खानपान के साथ यहां महाराष्ट्र की लोककला, संस्कृति और परंपराओं की झलक भी देखने को मिल रही है। कढी कोंडुळे : कई तरह के आटों से बनती हैं पूरियां महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के पास के क्षेत्र से आईं अलका पवार कढी कोंडुळे लेकर पहुंची हैं। इसे बनाने में चने की दाल, चावल, ज्वार और बेसन जैसे अलग-अलग आटों का इस्तेमाल किया जाता है। इनसे पूरियां तैयार की जाती हैं, जिनमें कई तरह के मसालों का स्वाद भी मिलता है। महाराष्ट्र के कुछ गांवों में बनने वाला यह पारंपरिक पकवान अपनी खास विधि और स्वाद के लिए जाना जाता है। वाटली दाल : छह घंटे भिगोकर तैयार करते हैं चने की दाल शिक्षिका श्वेता श्रावण वाटली दाल लेकर आई हैं। इसे बनाने के लिए चने की दाल को करीब छह घंटे तक भिगोया जाता है। इसके बाद उसका घोल तैयार कर पकाया जाता है। स्वाद में यह इंदौर के भुट्टे के कीस से कुछ मिलता-जुलता है। महाराष्ट्र में यह व्यंजन खासतौर पर मंगळागौरी की पूजा और गणेश चतुर्थी जैसे अवसरों पर बनाया जाता है। उंबर हांडी : मोदक की सब्जी के साथ बाजरे की भाकरी सु्प्रिया मेहकर की लाई उंबर हांडी भी लोगों का ध्यान खींच रही है। यह पतली ग्रेवी में बनने वाली मोदक की सब्जी है, जिसे बाजरे की भाकरी के साथ परोसा जाता है। इसके मोदक में भुने चने, खोपरा, खसखस, तिल और मूंगफली से तैयार भरावन डाली जाती है। इसे बनाने में करीब दो से ढाई घंटे लगते हैं। महाराष्ट्र के छोटे गांवों में प्रचलित यह व्यंजन खासकर होली के बाद बनाया जाता है। आयोजकों के मुताबिक, व्यस्त जीवनशैली के कारण अब ऐसे पारंपरिक पकवान घरों में कम बनाए जाते हैं। इसलिए फेस्टिवल के जरिए इन्हें लोगों तक पहुंचाने और इनकी परंपरा को सहेजने की कोशिश की जा रही है। 12 साल से मराठी विरासत को सहेज रहा जत्रा सर्व मराठी भाषी सोशल एंड कल्चरल सोसायटी की अध्यक्ष स्वाति काशिद ने बताया कि जत्रा का यह 12वां वर्ष है। ‘वारसा’ का अर्थ विरासत है। आयोजन का उद्देश्य मराठी संस्कृति और खानपान की परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है। इसके साथ ही महिलाओं को अपनी पाककला और हुनर दिखाने के लिए मंच भी उपलब्ध कराया जा रहा है। लावणी, लोक प्रस्तुतियां और किले की प्रतिकृति भी आकर्षण फेस्टिवल परिसर को भगवा थीम पर सजाया गया है। यहां छत्रपति शिवाजी महाराज के किले की प्रतिकृति और सेल्फी पॉइंट भी बनाए गए हैं। महाराष्ट्र से आए कलाकार लावणी के साथ आईचा गोंधळ, विठ्ठल-रुक्मिणी और स्वामी समर्थ से जुड़ी सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दे रहे हैं। खानपान के अलावा व्यापारिक स्टॉल भी लगाए गए हैं। आयोजन में सद्गुरु अन्ना महाराज, बाबा साहेब तराणेकर, कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय और समाजसेवी पंकज संघवी सहित अन्य अतिथि भी पहुंचे।



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