भगवान को जड़ नहीं, चेतन भाव से देखें:कथा वाचक इन्द्रेश उपाध्याय बोले- प्रभु से धन-ऐश्वर्य नहीं, भक्ति और करुणा मांगें; भजनों-जयकारों से गूंजा कथा स्थल




एमआर-10 स्थित स्टार चौराहे पर शुक्रवार से शुरू हुई कथावाचक इन्द्रेश उपाध्याय की श्रीमद्भागवत कथा में दो दिनों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। ‘मुकुंद माधव हरि, हरि बोल’, ‘जगन्नाथ चका नयन’ और ‘नंद के आनंद भयो, जय कन्हैया लाल की’ जैसे भजनों पर श्रद्धालु झूम उठे। कथावाचक ने भगवान के प्रति समर्पण, भक्ति और करुणा का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि भगवान को जड़ नहीं, चेतन भाव से देखना चाहिए। भक्त का प्रेम और श्रद्धा ही उसे भगवान को अपने बीच जीवंत अनुभव करने की शक्ति देते हैं। मनुष्य को भगवान से धन, ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं के बजाय भक्ति, सहजता और करुणा मांगनी चाहिए। इन्द्रेश उपाध्याय ने रावण के प्रसंग के माध्यम से मनुष्य को अपने भीतर झांकने की सीख दी। उन्होंने कहा कि कुछ दिन पहले ही हमने रावण दहन किया, लेकिन रावण में जिन अवगुणों का वर्णन मिलता है, कहीं न कहीं हम भी उन्हीं चीजों की चाह रखते हैं। रावण के पास इतना धन था कि कुबेर उसके घर में माली के समान थे। इसके बावजूद अहंकार, घमंड और असीम ऐश्वर्य की लालसा उसके पतन का कारण बनी। उन्होंने श्रद्धालुओं से सवाल किया कि यदि भगवान स्वयं सामने आकर एक इच्छा मांगने को कहें, तो क्या वे धन और ऐश्वर्य मांगेंगे या स्वयं प्रभु को? उन्होंने कहा कि मनुष्य को प्रभु से प्रभु को ही मांग लेना चाहिए। भक्त के प्रेम से ठाकुरजी के बाल हुए सफेद, संतों का सम्मान करने की दी सीख कथावाचक ने उदयपुर के राजघराने से जुड़ा एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक बार मंदिर के पुजारी ने ठाकुरजी को पहनाई जाने वाली माला स्वयं पहन ली और बाद में वही माला राजा को पहना दी। माला में सफेद बाल देखकर राजा ने पूछा कि क्या ठाकुरजी के बाल भी सफेद हो गए हैं। पुजारी ने घबराकर हां कह दिया। अगले दिन राजा ने ठाकुरजी का मुकुट उतरवाकर देखा तो उनके बाल वास्तव में सफेद दिखाई दिए। इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने संतों और भक्तों का सम्मान करने की सीख दी। उन्होंने कहा कि भगवान अपने भक्तों की चिंता दूर करने के लिए भी लीला करते हैं। भजनों पर झूमे श्रद्धालु, 12 एलईडी स्क्रीन पर हो रहा कथा का प्रसारण ‘गिरधारी कहो बनवारी’, ‘श्याम संग राधा नाचे रे’, ‘रास रचाई’ और ‘मुकुंद माधव हरि’ सहित कई भजनों की प्रस्तुति हुई। श्रद्धालु तालियां बजाते और हाथ उठाकर झूमते नजर आए। करीब 10 एकड़ क्षेत्र में आयोजित कथा प्रतिदिन शाम 4 से 7 बजे तक हो रही है। आयोजन स्थल पर 12 बड़ी एलईडी स्क्रीन के माध्यम से कथा का प्रसारण किया जा रहा है। श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, मेडिकल सहायता, बैठने और सुरक्षा की व्यवस्था की गई है। आयोजक आशीष गोयल ने बताया कि परिवार में गुरु परंपरा और भागवत कथा करवाने की प्रथा वर्षों से चली आ रही है। आयोजन सभी श्रद्धालुओं के लिए निशुल्क है। कथा की सीख जीवन में उतारना जरूरी, सत्य और सदाचार अपनाने का संदेश कथावाचक ने भागवत कथा का महत्व समझाते हुए कहा कि धार्मिक ग्रंथों में वर्णित प्रसंग केवल सुनने के लिए नहीं, बल्कि जीवन में उतारने के लिए भी हैं। मनुष्य को अपने व्यवहार में विनम्रता बनाए रखनी चाहिए और दूसरों के प्रति प्रेम तथा सम्मान का भाव रखना चाहिए। उन्होंने कहा कि जीवन में कठिन परिस्थितियां आने पर धैर्य बनाए रखना, अच्छे कर्म करना और जरूरतमंदों की सहायता करना जरूरी है। परिवार में बड़ों का सम्मान और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझना भी धार्मिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। केवल धार्मिक आयोजनों में शामिल होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि वहां से मिली शिक्षाओं को अपने व्यवहार में उतारना भी आवश्यक है।



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