इंदौर का सराफा 300 साल पुराना, 1890 में 30 दुकानें:अब 300 से अधिक; चीन-यूरोप तक होता था अफीम-कपास का कारोबार




इंदौर का सराफा बाजार सिर्फ सोने-चांदी के आभूषणों की खरीद-बिक्री का ठिकाना नहीं है। इसकी गलियों में करीब तीन शताब्दियों का व्यापारिक इतिहास, होलकर राजघराने की दूरदर्शिता, देश-विदेश तक फैले कारोबारी रिश्ते, जौहरियों की दस्तकारी और कई ऐतिहासिक घटनाएं दर्ज हैं। आज जिस सराफा को इंदौर की पहचान के रूप में जाना जाता है, कभी वही इलाका अफीम, कपास और कीमती धातुओं के बड़े कारोबार का केंद्र हुआ करता था। इस बाजार की शुरुआत राजवाड़ा बनने से भी पहले हो चुकी थी। समय के साथ यहां व्यापारियों और कारीगरों की बस्तियां विकसित हुईं। गुजरात, राजस्थान, मालवा और महाराष्ट्र से व्यापारी यहां पहुंचे। सोने-चांदी के कारोबार ने इसे देश के प्रमुख बुलियन बाजारों में शामिल कर दिया। दीपावाली के मौके पर दैनिक भास्कर ने विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ और इतिहासकार खासकर जफर अंसारी से बातचीत की। उन्होंने ऐतिहासिक दस्तावेजों के आधार पर सराफा के 300 साल पुराना बताया। साथ ही ऐतिहासिक तस्वीरें भी साझा की। राजवाड़ा से पहले बस चुकी थी व्यापारिक बस्ती इतिहासकार जफर अंसारी ने बताया कि इंदौर के व्यवस्थित व्यापारिक इतिहास की शुरुआत 18वीं सदी के शुरुआती वर्षों में मानी जाती है। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, 1716 में जमींदार राव राजा नंदलाल मंडलोई ने यहां पहली व्यवस्थित व्यापारिक बस्ती बसाई थी। आगे चलकर इस इलाके को उनके नाम पर नंदलालपुरा कहा गया। यह वह दौर था, जब इंदौर धीरे-धीरे व्यापारिक गतिविधियों का केंद्र बन रहा था। 1747 में राजवाड़ा का निर्माण हुआ, लेकिन उससे पहले ही यहां व्यापारियों की आवाजाही और कारोबारी गतिविधियां शुरू हो चुकी थीं। 1852 में महाराजा तुकोजीराव होलकर द्वितीय के राज्याभिषेक तक इंदौर का व्यापार काफी विस्तार ले चुका था। होलकर शासकों ने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए कई प्रयास किए। इसी क्रम में भगवान शिव और होलकर परिवार के आराध्य देवता के नाम पर ‘सदाशिव मार्तंड’ नाम से सरकारी व्यापारिक दुकान शुरू करवाई गई। इसकी शुरुआत छोटा सराफा से हुई। इसकी एक शाखा मुंबई में भी थी। व्यापारियों के हितों की रक्षा और कारोबार से जुड़े विवादों के समाधान के लिए छोटा सराफा में ‘ग्यारह पंच’ नाम की व्यापारिक संस्था भी बनाई गई। इससे पता चलता है कि उस दौर में सराफा केवल खरीद-बिक्री का स्थान नहीं था, बल्कि यहां व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए संस्थागत व्यवस्थाएं भी विकसित हो रही थीं। अफीम और कपास के कारोबार से चीन-यूरोप तक पहुंच सराफा और इंदौर के व्यापारिक विस्तार में अफीम और कपास का कारोबार बेहद महत्वपूर्ण रहा। इस कारोबार ने इंदौर को देश के दूसरे बड़े व्यापारिक केंद्रों से जोड़ा। मुंबई और कोलकाता जैसे शहरों के साथ यहां के व्यापारिक संबंध मजबूत हुए। भारत के ‘कॉटन प्रिंस’ कहे जाने वाले सर सेठ हुकुमचंद ने इंदौर के व्यापार को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने में बड़ी भूमिका निभाई। उनके कारोबारी नेटवर्क का विस्तार चीन, मध्य पूर्व और यूरोप तक था। कपास और अफीम के व्यापार से आने वाली पूंजी ने इंदौर के व्यापारिक ढांचे को मजबूती दी। उस समय सराफा में सोने-चांदी के साथ अन्य कीमती वस्तुओं का कारोबार भी होता था। व्यापारियों की बढ़ती संख्या के साथ यह इलाका धीरे-धीरे जौहरियों और कीमती धातुओं के कारोबार का बड़ा केंद्र बनने लगा। 1890 में थीं 30 दुकानें, अब 300 के पार 19वीं सदी के अंतिम वर्षों तक छोटा सराफा सोने-चांदी और कीमती धातुओं के कारोबार के लिए स्थापित बाजार बन चुका था। ऐतिहासिक दस्तावेजों के मुताबिक, 1890 में यहां सोने-चांदी के कारोबार से जुड़ी करीब 30 दुकानें थीं। अगले पांच दशकों में बाजार का तेजी से विस्तार हुआ और 1941 तक इनकी संख्या 100 से अधिक हो गई। उस दौर में अफीम और कपास के बदले चांदी का कारोबार भी किया जाता था। इससे सराफा की भूमिका केवल स्थानीय बाजार तक सीमित नहीं रही। यहां होने वाले सौदों का संबंध दूसरे शहरों और व्यापारिक केंद्रों से भी था। सराफा में श्री इंदौर बुलियन एक्सचेंज लिमिटेड का कार्यालय भी स्थापित हुआ। इसका उद्देश्य सोने-चांदी के कारोबार को प्रोत्साहन देना और व्यापारिक गतिविधियों को व्यवस्थित करना था। इस तरह बाजार में जौहरियों के साथ बुलियन कारोबार से जुड़े बड़े व्यापारियों की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। गुजरात-राजस्थान से आए व्यापारी, पुणे के सिनारकर सुनारों ने बनाई पहचान इंदौर के सराफा बाजार की एक खासियत यह भी रही कि यहां अलग-अलग क्षेत्रों के व्यापारी और कारीगर आकर बसे। गुजरात, राजस्थान और मालवा के व्यापारियों ने यहां कारोबार को विस्तार दिया। पुणे के प्रसिद्ध सिनारकर सुनारों ने अपनी पारंपरिक दस्तकारी और आभूषण निर्माण की कला से अलग पहचान बनाई। उनके बनाए आभूषणों की कारीगरी और बारीक काम बाजार की खासियत बने। धीरे-धीरे सराफा में आभूषण निर्माण, सोने-चांदी की शुद्धता, तौल और लेनदेन की अपनी व्यवस्था विकसित हुई। पीढ़ियों से कारोबार करने वाले परिवारों ने इस बाजार की परंपरा को आगे बढ़ाया। यही वजह है कि सराफा की पहचान सिर्फ दुकानों की संख्या से नहीं, बल्कि यहां के कारीगरों और व्यापारिक भरोसे से भी बनी। 1784 की डकैती में 9 की हत्या, बनाई पुलिस चौकी सराफा का इतिहास सिर्फ व्यापारिक तरक्की की कहानियों तक सीमित नहीं है। इस बाजार ने कई मुश्किल दौर भी देखे हैं। ऐतिहासिक दस्तावेजों में 12 जून 1784 की एक बड़ी डकैती का उल्लेख मिलता है। बताया जाता है कि डकैतों ने जौहरी सेठ अनुपचंद की दुकान पर हमला किया था। इस दौरान करीब 2 हजार रुपए लूटे गए और नौ लोगों की हत्या कर दी गई। घटना ने पूरे व्यापारिक क्षेत्र को हिलाकर रख दिया। इसके बाद होलकर शासकों ने बाजार की सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की और यहां पुलिस चौकी स्थापित की। व्यापारियों और उनकी कीमती संपत्तियों की सुरक्षा के लिहाज से यह बड़ा कदम था। बाजार में मौजूद पुरानी पुलिस चौकी आज भी इस ऐतिहासिक घटना और उस दौर की सुरक्षा व्यवस्था की याद दिलाती है। सोने-चांदी की शुद्धता और सही तौल के लिए था पुराना धर्मकांटा पुराने सराफा बाजार की व्यवस्था में तौल और शुद्धता का विशेष महत्व था। सोने-चांदी के कारोबार में ग्राहकों का भरोसा बनाए रखने के लिए सही वजन और धातु की गुणवत्ता सुनिश्चित करना जरूरी था। इसी व्यवस्था का हिस्सा बाजार में मौजूद पुराना धर्मकांटा भी रहा। व्यापार के उस दौर में ऐसे कांटों का इस्तेमाल वजन की पुष्टि और लेनदेन में पारदर्शिता के लिए किया जाता था। छोटा सराफा में भैरू महाराज मंदिर के पास लगा पुराना बोर्ड भी बाजार की ऐतिहासिक पहचान का हिस्सा है। बताया जाता है कि लोहे और इनेमल से बना यह बोर्ड 1890 में होलकर शासनकाल में लगाया गया था। आज भी यह पुराने रियासती इंदौर की याद दिलाता है। 1927 में व्यापारी एसोसिएशन, स्वतंत्रता आंदोलन में भी योगदान सराफा के कारोबार को संगठित करने की दिशा में 1927 में इंदौर चांदी-सोना जवाहरात व्यापारी एसोसिएशन की स्थापना हुई। इस संगठन ने व्यापारियों के हितों की रक्षा करने के साथ बाजार से जुड़े विषयों को व्यवस्थित करने में भूमिका निभाई। इस संगठन का इतिहास स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़ा रहा है। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार, एसोसिएशन ने देश की आजादी की लड़ाई के लिए आर्थिक सहयोग दिया था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सराफा की गलियों में लाठीचार्ज और गोलियां चलने की घटनाएं भी सामने आई थीं। इस तरह यह बाजार केवल आर्थिक गतिविधियों का केंद्र नहीं रहा, बल्कि इंदौर के सामाजिक और राजनीतिक इतिहास का भी हिस्सा बना। चारों कोनों पर भैरव मंदिर, जती मंदिर भी है खास पहचान सराफा की पहचान यहां मौजूद पुराने मंदिरों से भी जुड़ी है। बाजार के चारों कोनों पर भैरव महाराज के मंदिर हैं। बड़ा सराफा में प्राचीन जती मंदिर भी स्थित है। इन मंदिरों से व्यापारियों और स्थानीय लोगों की आस्था जुड़ी हुई है। पुराने समय में बाजार की गतिविधियों के साथ धार्मिक आयोजन और सामाजिक मेलजोल भी इसी क्षेत्र में होता था। बाजार की बनावट, पुरानी दुकानें, मंदिर, ऐतिहासिक बोर्ड और पारंपरिक कारोबारी व्यवस्थाएं मिलकर सराफा को इंदौर की महत्वपूर्ण विरासत बनाती हैं। कभी बारिश और धूप पर भी लगता था दांव सराफा के पुराने इतिहास में कारोबार के अलावा कुछ दिलचस्प किस्से भी दर्ज हैं। इतिहासकार और विरासत संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञ जफर अंसारी बताते हैं कि यहां पुराने समय में ‘टपरे का सट्टा’ और ‘गेट का सट्टा’ जैसे खेल प्रचलित थे। टपरे के सट्टे में बारिश होने के पांच घंटे के भीतर टीन की छतों से पानी टपकेगा या नहीं, इस पर दांव लगाया जाता था। वहीं गेट के सट्टे में घने बादलों के बाद धूप निकलेगी या नहीं, इस बात पर पैसा लगाया जाता था। समय के साथ इन खेलों का स्वरूप बदलता गया और वे अंकों पर आधारित सट्टेबाजी में बदल गए। ये किस्से बताते हैं कि सराफा की गलियों में व्यापार के साथ उस दौर का सामाजिक जीवन भी किस तरह चलता था। 300 साल में बदला स्वरूप, लेकिन व्यापारिक पहचान आज भी कायम नंदलाल मंडलोई की बसाई शुरुआती व्यापारिक बस्ती से शुरू हुआ सराफा का सफर होलकर राजघराने के संरक्षण में आगे बढ़ा। अफीम और कपास के कारोबार से लेकर सोने-चांदी के बड़े बाजार तक इसका विस्तार हुआ। अलग-अलग राज्यों से आए व्यापारियों, सुनारों और कारीगरों ने इसे समृद्ध बनाया। आज भी छोटा और बड़ा सराफा इंदौर की व्यापारिक पहचान के महत्वपूर्ण हिस्से हैं। यहां पीढ़ियों से कारोबार कर रहे परिवार बाजार की परंपराओं को आगे बढ़ा रहे हैं। सराफा का इतिहास बताता है कि किसी शहर की पहचान सिर्फ उसकी इमारतों या सड़कों से नहीं बनती। उसके बाजार, व्यापारी, कारीगर और उनसे जुड़ी पीढ़ियों की कहानियां भी शहर की विरासत होती हैं। सराफा चौपाटी: जौहरियों के बाजार बनी जायके की पहचान सराफा की पहचान धीरे-धीरे सिर्फ सोने-चांदी के कारोबार तक सीमित नहीं रही। बाजार में आने वाले ग्राहक और व्यापारी शाम को मिठाइयों और दूध-मावे से बने व्यंजनों की दुकानों पर रुकने लगे। अखाड़ों के पहलवान भी यहां रबड़ी और मिठाइयों का आनंद लेने पहुंचते थे। विजय चाट हाउस जैसी दुकानों ने इस खानपान की परंपरा को आगे बढ़ाया। 1970 के दशक में यहां पैटीज और कचौरी जैसी चीजें महज 10 पैसे में मिलती थीं। बाद में शर्मा स्वीट्स, जोशी दही बड़ा, नागोरी शिकंजी, रबड़ी गुरु और अग्रवाल स्वीट्स जैसे प्रतिष्ठानों ने अपनी अलग पहचान बनाई। सोने-चांदी के आभूषण खरीदने आने वाले परिवार मिठाई की दुकानों पर भी रुकते थे। नई खरीदारी की खुशी मिठाई के साथ मनाने की परंपरा ने कारोबार और खानपान को एक-दूसरे से जोड़ दिया। इसी तरह रात में सजने वाली दुकानों ने सराफा को देशभर में मशहूर कर दिया। 2023 के प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के दौरान विदेशी मेहमानों ने भी यहां के जायकों का आनंद लिया था।



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