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बड़े नोट बदलवाए, बिना नाम लिए विधानसभा में हुई चर्चा:CM सेठी बोले- यह तो गवर्नर का मामला है; एमपी के मुख्यमंत्रियों के अनसुने किस्से




प्रदेश आज अपना 71वां स्थापना दिवस मना रहा है। 1 नवंबर 1956 को नए मध्य प्रदेश का गठन हुआ था। इन 7 दशक में प्रदेश ने कई राजनीतिक उतार-चढ़ाव देखे। कभी कांग्रेस की सरकार रही तो कभी गैर-कांग्रेसी दलों ने सत्ता संभाली। किसी मुख्यमंत्री का कार्यकाल कुछ दिनों का रहा तो किसी ने लगातार 10 साल तक सरकार चलाई। इन मुख्यमंत्रियों के राजनीतिक फैसलों के साथ उनके कार्यकाल के कई ऐसे किस्से भी हैं, जो आज भी याद किए जाते हैं। ऐसा ही एक किस्सा तत्कालीन राज्यपाल बाबू सत्यनारायण सिंह से जुड़ा है। चर्चा थी कि नोटबंदी की आशंका के चलते उन्होंने 2 लाख रुपए के बड़े नोट छोटे नोटों में बदलवाए थे। मामला विधानसभा पहुंच गया। विधायक होमी दाजी ने बिना नाम लिए मुद्दा उठा दिया। मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी ने चर्चा के बीच खुद ही कह दिया कि यह मामला राज्यपाल से जुड़ा है। इस पर सदन में चर्चा नहीं हो सकती। इसके बाद उन्होंने चर्चा को कार्यवाही से विलोपित करवा दिया। वरिष्ठ पत्रकार, लेखक और माधवराव सप्रे समाचारपत्र संग्रहालय के संचालक विजयदत्त श्रीधर ने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्रियों से जुड़े ये किस्से साझा किए हैं। इनमें विधानसभा के भीतर हुए हास-परिहास से लेकर सत्ता परिवर्तन, नेताओं की सादगी, उनके राजनीतिक अंदाज और निजी जीवन के दिलचस्प प्रसंग शामिल हैं। मुख्यमंत्रियों के कार्यकाल के 19 दिलचस्प किस्से नई पीढ़ी के लिए जगह छोड़ने की सलाह नए मध्य प्रदेश की पहली विधानसभा की बैठक 17 दिसंबर 1956 को हुई। रविशंकर शुक्ल मुख्यमंत्री और ठाकुर निरंजन सिंह नेता प्रतिपक्ष थे। सदन में एक विधायक उपाध्याय ने करीब 80 साल के शुक्ल को राजनीति से संन्यास लेकर नई पीढ़ी के लिए जगह छोड़ने की सलाह दी। इस पर विधायक गुलाबचंद तामोट ने जवाब दिया कि इस उम्र में तो मेनका ने विश्वामित्र की तपस्या भंग की थी। यह सुनकर सदन ठहाकों से गूंज उठा। वरिष्ठ पत्रकार विजयदत्त श्रीधर के मुताबिक, उस दौर में विधानसभा में बहस के बीच हास-परिहास का ऐसा माहौल भी बनता था। तीसरी बार पूरा नहीं कर सके कार्यकाल मध्य प्रदेश के राजनीतिक इतिहास में भगवंतराव मंडलोई का नाम दो बार मुख्यमंत्री बनने के लिए दर्ज है। उनका पहला कार्यकाल महज 30 दिन का था। कैलाशनाथ काटजू के बाद उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया, लेकिन 1957 के विधानसभा चुनाव के बाद फिर नेतृत्व बदला और काटजू मुख्यमंत्री बने। पांच साल बाद 1962 में मंडलोई को दोबारा मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। इस बार उन्होंने करीब डेढ़ साल तक सरकार चलाई। उनके राजनीतिक जीवन का दिलचस्प पहलू यही रहा कि दो बार मुख्यमंत्री पद संभालने के बावजूद वे किसी भी बार पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। एमपी आने से पहले राष्ट्रीय राजनीति का बड़ा नाम कैलाशनाथ काटजू मध्यप्रदेश के शुरुआती मुख्यमंत्रियों में शामिल रहे। वे पहले से राष्ट्रीय राजनीति में बड़ा नाम थे और केंद्र में रक्षा तथा गृह मंत्रालय जैसे महत्वपूर्ण पद संभाल चुके थे। 1957 के विधानसभा चुनाव से पहले कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें मध्यप्रदेश की जिम्मेदारी सौंपी। उनके कार्यकाल में प्रदेश की प्रशासनिक और राजनीतिक व्यवस्था को नए सिरे से मजबूत करने की कोशिश हुई। काटजू के बारे में भुलक्कड़ स्वभाव के कई किस्से भी सुनाए जाते हैं। रेडियो पर गाना बजा- ‘चल उड़ जा रे पंछी’ द्वारका प्रसाद मिश्र के खिलाफ गोविंद नारायण सिंह ने अविश्वास प्रस्ताव रखा था। इस बहस में गोविंद नारायण सिंह ने मिश्र की चर्चित काव्य रचना ‘कृष्णायन’ को ही अपना आधार बना लिया। वे पुस्तक से उद्धरण देते और मिश्र को उन्हीं उद्धरणों का जवाब देना पड़ता। बाद में वित्तीय प्रस्ताव पर मतदान में सरकार हार गई। सदन से बाहर निकले सत्ता पक्ष के नेता तनाव में थे। तभी पुराने मिंटो हॉल के सामने इमली के पेड़ के नीचे रेडियो पर गाना बजा- ‘चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना…’ सरकार गिरने के तनाव के बीच यह गाना सुनकर नेता भी हंस पड़े। यह प्रसंग विजयदत्त श्रीधर ने सुनाया है। लंबे राजनीतिक वर्चस्व को पहली बड़ी चुनौती गोविंद नारायण सिंह ने तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारका प्रसाद मिश्र के खिलाफ कांग्रेस में बगावत की और कई विधायकों के साथ अलग रास्ता चुना। इसके बाद प्रदेश में संविद सरकार बनी, जिसमें जनसंघ, समाजवादी और कांग्रेस के बागी विधायक शामिल थे। यह मध्यप्रदेश में कांग्रेस के लंबे राजनीतिक वर्चस्व को पहली बड़ी चुनौती थी। इस सरकार की खासियत यह थी कि अलग-अलग विचारधाराओं के दल और विधायक एक साथ आए थे। हालांकि गठबंधन ज्यादा समय तक नहीं चल सका। गोविंद नारायण सिंह की सरकार के बाद प्रदेश को आदिवासी मुख्यमंत्री के रूप में राजा नरेशचंद्र सिंह मिले। अब तक के इकलौते आदिवासी मुख्यमंत्री सारंगढ़ रियासत के राजा नरेशचंद्र सिंह मध्यप्रदेश के पहले और अब तक के इकलौते आदिवासी मुख्यमंत्री रहे हैं। गोविंद नारायण सिंह के इस्तीफे के बाद उन्हें 13 मार्च 1969 को मुख्यमंत्री बनाया गया। लेकिन राजनीतिक समीकरण उनके पक्ष में नहीं थे। सरकार का बहुमत और कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान उनके सामने बड़ी चुनौती थी। आखिरकार 25 मार्च को उन्होंने इस्तीफा दे दिया। उनका कार्यकाल महज 13 दिन रहा। मध्यप्रदेश के राजनीतिक इतिहास में यह एक अनोखा रिकॉर्ड है कि आदिवासी समुदाय से आने वाले मुख्यमंत्री को प्रदेश की कमान तो मिली, लेकिन वे दो सप्ताह भी पद पर नहीं रह सके। एक ही परिवार की दो पीढ़ियों ने मुख्यमंत्री पद संभाला श्यामाचरण शुक्ल मध्यप्रदेश के ऐसे मुख्यमंत्री रहे, जिनके पिता पंडित रविशंकर शुक्ल भी प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। वे तीन बार इस पद पर पहुंचे। पहली बार राजा नरेशचंद्र सिंह के इस्तीफे के बाद उन्हें सरकार की कमान मिली। दूसरी बार आपातकाल के दौरान प्रकाशचंद्र सेठी की जगह मुख्यमंत्री बनाए गए। तीसरी बार 1989 में कांग्रेस की वापसी के बाद उन्होंने पद संभाला। उनका राजनीतिक सफर इस लिहाज से खास रहा कि मध्यप्रदेश में एक ही परिवार की दो पीढ़ियों ने मुख्यमंत्री पद संभाला। राष्ट्रीय राजनीति में भी पिता और बेटे के मुख्यमंत्री बनने के उदाहरण कम ही रहे हैं। बिना नाम लिए सदन में उठा मामला, दिया जवाब 1972 से 1975 के बीच मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी के कार्यकाल में राज्यपाल बाबू सत्यनारायण सिंह से जुड़ा एक मामला सामने आया। चर्चा थी कि राज्यपाल ने नोटबंदी की आशंका के चलते 2 लाख रुपए के बड़े नोट भारतीय स्टेट बैंक की शाखा से छोटे नोटों में बदलवाए थे। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक होमी दाजी को इसकी जानकारी मिली तो उन्होंने विधानसभा में बिना नाम लिए मामला उठा दिया। उन्होंने कहा कि बड़े नोट बंद होने की आशंका से समाज में दहशत फैल सकती है। चर्चा के अंत में सेठी ने खुद कहा कि यह मामला राज्यपाल से जुड़ा है और संवैधानिक प्रमुख के बारे में सदन में चर्चा नहीं हो सकती। इसके बाद चर्चा कार्यवाही से विलोपित कर दी गई। यह किस्सा विजयदत्त श्रीधर ने सुनाया है। विनम्रता और सहज व्यक्तित्व से बनी अलग पहचान आपातकाल के बाद मध्यप्रदेश में जनता पार्टी की सरकार बनी और कैलाश जोशी मुख्यमंत्री बने। सादगी और साफ-सुथरी राजनीतिक छवि के कारण उन्हें अलग पहचान मिली। वे मुख्यमंत्री रहते हुए भी सामान्य जीवनशैली अपनाते थे। वर्ष 2004 में भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी ने सार्वजनिक मंच से उनकी तारीफ करते हुए उन्हें राजनीति का संत बताया। इस पर जोशी ने सहज अंदाज में जवाब दिया कि वे अभी संत नहीं बने हैं। उनका यह जवाब उनकी विनम्रता और सहज राजनीतिक व्यक्तित्व के रूप में याद किया जाता है। गुटबाजी के बीच चलानी पड़ी सरकार कैलाश जोशी के बाद वीरेंद्र कुमार सखलेचा मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। जनता पार्टी के भीतर लगातार चल रही खींचतान और गुटबाजी के बीच उन्हें सरकार चलानी पड़ी। उस समय केंद्र और राज्यों में जनता पार्टी के भीतर कई धड़े सक्रिय थे। सखलेचा का कार्यकाल भी इसी राजनीतिक अस्थिरता की भेंट चढ़ा। जनवरी 1980 में उनकी सरकार चली गई और प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ। उनके नाम से नेपाल यात्रा और दो सूटकेस से जुड़ा एक राजनीतिक किस्सा भी सुनाया जाता है, लेकिन उसमें क्या था, इसकी पुष्टि नहीं है। इसलिए उस प्रसंग को प्रमाणित घटना के रूप में नहीं रखा जा सकता। पटवा को महिला विधायक ने भेंट की थीं चूड़ियां सुंदरलाल पटवा दो बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान 1991 में विधानसभा में महिला विधायक कल्याणी पांडे ने उन्हें चूड़ियां भेंट की थीं। इसके बाद सदन में विवाद बढ़ा और जूता कांड भी हुआ। घटना के बाद पटवा ने विधानसभा में भावुक होकर माफी मांगी थी। उन्होंने कल्याणी पांडे को अपनी बेटी की तरह बताते हुए उनके खिलाफ हुई अमर्यादित टिप्पणी पर खेद जताया। इस प्रसंग का उल्लेख पूर्व विधायक कल्याणी पांडे ने एक साक्षात्कार में भी किया था। यह घटना बताती है कि उस दौर में विधानसभा के भीतर राजनीतिक विरोध किस तरह व्यक्तिगत टकराव तक पहुंच जाता था। मध्य प्रदेश का एक दिन का मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह तीन बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बने। मार्च 1985 में विधानसभा चुनाव के बाद कांग्रेस की जीत हुई और उन्होंने दोबारा मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लेकिन अगले ही दिन उन्हें केंद्र की राजनीति में भेजने का फैसला हुआ। उन्हें पंजाब का राज्यपाल बनाया गया। इसके बाद उन्होंने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया और मोतीलाल वोरा को प्रदेश की कमान सौंपी गई। इस तरह उनका दूसरा कार्यकाल महज दो तारीखों तक दर्ज हुआ। इसी वजह से उन्हें मध्य प्रदेश का एक दिन का मुख्यमंत्री भी कहा जाता है। रात 1 बजे बाल कटवाने का मन हुआ मोतीलाल वोरा राजनीति में आने से पहले पत्रकारिता से जुड़े थे। उनके मुख्यमंत्री रहते एक दिलचस्प किस्सा चर्चा में आया। बताया जाता है कि एक बार वे ग्वालियर दौरे पर थे। रात करीब एक बजे उन्हें बाल कटवाने का मन हुआ। उन्होंने अधिकारियों से नाई बुलाने को कहा। पुलिस ने रात में ही चार नाई बुलवा लिए, लेकिन तब तक मुख्यमंत्री सो चुके थे। नाइयों को रातभर थाने में बैठाए रखा गया। सुबह उन्हें मुख्यमंत्री के पास ले जाया गया। बाल कटवाने के बाद एक नाई ने मुख्यमंत्री के साथ फोटो खिंचवाने की इच्छा जताई और फोटोग्राफर भी साथ ले आया। यह प्रसंग उनके कार्यकाल से जुड़ा चर्चित किस्सा है। राजनीतिक अंदाज पर खूब बने कार्टून दिग्विजय सिंह मध्यप्रदेश के उन मुख्यमंत्रियों में शामिल हैं, जिन्होंने लगातार दो विधानसभा चुनाव जीतकर दस साल तक सरकार चलाई। उनके कार्यकाल में पंचायत राज और ग्रामीण विकास को लेकर कई फैसले हुए। उनके राजनीतिक अंदाज पर अखबारों में कार्टून और व्यंग्य भी खूब बने। प्रसंग के मुताबिक, वे अपनी खिंचाई करने वाले कार्टून को भी सहजता से लेते थे। राजनीतिक कार्टून उनके सार्वजनिक व्यक्तित्व का हिस्सा रहे। मुख्यमंत्री का पद छोड़नी सबसे बड़ी गलती उमा भारती मध्यप्रदेश की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं। दिसंबर 2003 में भाजपा की जीत के बाद उन्होंने प्रदेश की कमान संभाली। लेकिन कर्नाटक के हुबली में तिरंगा आंदोलन से जुड़े पुराने मामले में गिरफ्तारी वारंट जारी होने के बाद अगस्त 2004 में उन्होंने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बाबूलाल गौर को मुख्यमंत्री बनाया गया। इस्तीफे के करीब दो साल बाद उमा भारती ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि मुख्यमंत्री पद छोड़ना उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी गलती थी। उनका यह बयान राजनीतिक गलियारों में काफी चर्चा में रहा। अतिक्रमण हटवाए, नाम पड़ा ‘बुलडोजर गौर’ बाबूलाल गौर को मध्यप्रदेश की राजनीति में सख्त प्रशासक के रूप में जाना जाता रहा। मुख्यमंत्री बनने से पहले नगरीय प्रशासन मंत्री रहते हुए उन्होंने भोपाल में अतिक्रमण हटाने के लिए बड़े स्तर पर कार्रवाई कराई थी। गौतम नगर सहित शहर के कई इलाकों में अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर चलवाए गए। इस सख्त कार्रवाई के कारण उन्हें ‘बुलडोजर गौर’ कहा जाने लगा। उनका यह उपनाम इतना चर्चित हुआ कि बाद में भी उनकी पहचान इसी नाम से होने लगी। गौर का राजनीतिक सफर मजदूर आंदोलन से शुरू हुआ था और वे लंबे समय तक विधायक रहे। आंदोलन किया तो खानी पड़ी डांट शिवराज सिंह चौहान ने अपने बचपन का एक किस्सा सुनाते हुए बताया था कि करीब सात साल की उम्र में उन्होंने मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने के लिए आंदोलन किया था। उन्होंने देखा कि मजदूरों को कम मजदूरी मिल रही है। इसके बाद उन्होंने गांव के लोगों को इकट्ठा किया और मजदूरी बढ़ाने की मांग उठाई। जुलूस निकालने की कोशिश भी की, लेकिन जब यह बात उनके परिवार तक पहुंची तो उन्हें डांट पड़ी और आंदोलन खत्म हो गया। शिवराज ने इसे अपने जीवन का पहला आंदोलन बताया था। आगे चलकर यही सामाजिक और राजनीतिक सक्रियता उनके सार्वजनिक जीवन का हिस्सा बनी। 15 महीने ही चल सकी कमलनाथ सरकार कमलनाथ ने दिसंबर 2018 में कांग्रेस की सरकार बनाई। विधानसभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी और बसपा, सपा तथा निर्दलीय विधायकों के समर्थन से सरकार बनी। लेकिन मार्च 2020 में ज्योतिरादित्य सिंधिया के कांग्रेस छोड़ने और उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफे के बाद सरकार अल्पमत में आ गई। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर विधानसभा में बहुमत परीक्षण होना था। मतदान से पहले ही कमलनाथ ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनकी सरकार करीब 15 महीने चली। मध्यप्रदेश की राजनीति में यह सत्ता परिवर्तन एक बड़े घटनाक्रम के रूप में दर्ज हुआ। डॉ. मोहन यादव ने बदली उज्जैन की परंपरा डॉ. मोहन यादव ने मुख्यमंत्री बनने के कुछ दिन बाद ही उज्जैन में रात्रि विश्राम किया। उज्जैन को लेकर लंबे समय से एक मान्यता प्रचलित थी कि यहां के राजा महाकाल हैं, इसलिए कोई मुख्यमंत्री शहर में रात नहीं बिताता। इसी वजह से कई मुख्यमंत्री उज्जैन दौरे के बाद रात होने से पहले लौट जाते थे। मोहन यादव ने इस परंपरा को चुनौती देते हुए उज्जैन में रात बिताई। उन्होंने कहा था कि महाकाल यहां के राजा हैं और हम सब उनके बेटे हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने गृह नगर में रात्रि विश्राम का उनका फैसला चर्चा में रहा।



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