घर में बच्चा रोया तो मोबाइल पकड़ा दिया, खाना खाते समय कार्टून चला दिया और पढ़ाई के लिए स्क्रीन सामने रख दी। माता-पिता के लिए यह रोजमर्रा की बात बन गई है, लेकिन बच्चों की आंखों की सेहत को लेकर यही आदत चिंता बढ़ा रही है।
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शहरी बच्चों में मायोपिया यानी दूर की नजर कमजोर होने की समस्या तेजी से बढ़ रही है। इंदौर में आयोजित नेत्र रोग विशेषज्ञों के सम्मेलन में विशेषज्ञों ने शहरी बच्चों में चश्मा लगने का आंकड़ा करीब 70% तक होने की बात कही।
डॉक्टरों के मुताबिक, कम उम्र में माइनस नंबर शुरू होने और उसके लगातार बढ़ने से आंखों की सेहत पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है। ऐसे में बच्चों की स्क्रीन आदतों के साथ उनकी आंखों की नियमित जांच और बाहर खेलने के समय पर भी ध्यान देना जरूरी है।
इंदौर के ब्रिलियंट कन्वेंशन सेंटर में शनिवार को मध्य प्रदेश स्टेट ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी (MPSOS) के 49वें वार्षिक सम्मेलन की शुरुआत हुई।
इसमें देशभर से 700 से अधिक नेत्र रोग विशेषज्ञ और प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हुए। तीन दिवसीय सम्मेलन में बच्चों में बढ़ते मायोपिया, मोतियाबिंद के आधुनिक इलाज और डायबिटीज से आंखों को होने वाले नुकसान सहित नेत्र चिकित्सा की नई तकनीकों पर चर्चा हो रही है।
हालांकि, कम उम्र में बच्चों को चश्मा लगने और आंखों का माइनस नंबर बढ़ने की समस्या प्रमुख चिंता के रूप में सामने आई।
मोबाइल से ऑनलाइन पढ़ाई तक, आंखों पर बढ़ा स्क्रीन का बोझ
दिल्ली से आए डॉ. संजय चौधरी के अनुसार, अब छोटे बच्चों के हाथ में भी मोबाइल आसानी से पहुंच जाता है। माता-पिता घर के काम में व्यस्त हों तो बच्चे को शांत रखने के लिए मोबाइल दे देते हैं।
धीरे-धीरे स्क्रीन मनोरंजन से आगे बढ़कर पढ़ाई और रोजमर्रा की गतिविधियों का हिस्सा बन जाती है। ऑनलाइन क्लास और कंप्यूटर पर पढ़ाई के कारण भी बच्चों का स्क्रीन टाइम बढ़ा है।
लंबे समय तक नजदीक से स्क्रीन देखना, बाहर खेलने के लिए कम समय निकालना और प्राकृतिक रोशनी में कम रहना मायोपिया के बढ़ते जोखिम से जुड़े कारक हैं।
हालांकि, चश्मे का नंबर बढ़ने के लिए केवल मोबाइल से निकलने वाले रेडिएशन को जिम्मेदार मानना सही नहीं है। मायोपिया के पीछे आनुवंशिक कारणों और जीवनशैली समेत कई कारकों की भूमिका हो सकती है।

कांफ्रेस में शामिल विशेषज्ञ।
माइनस 35 तक पहुंच रहा नंबर, रेटिना की जटिलताओं का खतरा
डॉ. संजय चौधरी ने बताया कि उन्होंने माइनस 35 तक के नंबर वाले मरीज भी देखे हैं। मायोपिया में दूर की चीजें साफ दिखाई नहीं देतीं। यदि यह समस्या कम उम्र में शुरू हो जाए और लगातार बढ़ती रहे, तो अधिक मायोपिया की स्थिति में रेटिना से जुड़ी गंभीर जटिलताओं का खतरा भी बढ़ सकता है। ऐसे मरीजों के लिए नियमित जांच और फॉलोअप महत्वपूर्ण है।
बच्चों में मायोपिया की पहचान केवल उनके मोबाइल इस्तेमाल के समय से नहीं की जा सकती। यदि बच्चा दूर का बोर्ड देखने में परेशानी बताए, टीवी के बहुत पास बैठने लगे, किताब आंखों के नजदीक रखकर पढ़े या बार-बार आंखें मिचमिचाए, तो उसकी आंखों की जांच करानी चाहिए।
समय पर समस्या का पता चलने से नंबर की निगरानी और उसके बढ़ने की गति को नियंत्रित करने के विकल्पों पर विचार किया जा सकता है।
चश्मा लगने के बाद भी नियमित जांच जरूरी
विशेषज्ञों के मुताबिक, बच्चे को चश्मा लगने के बाद आंखों की जांच बंद नहीं करनी चाहिए। नियमित अंतराल पर नंबर की जांच कराना जरूरी है, ताकि मायोपिया बढ़ने की स्थिति का समय पर पता चल सके। जरूरत के अनुसार डॉक्टर विशेष आई ड्रॉप्स, मायोपिया कंट्रोल लेंस और अन्य उपचार विकल्प सुझा सकते हैं। कौन-सा विकल्प बेहतर होगा, यह बच्चे की उम्र, आंखों के नंबर और जांच के नतीजों पर निर्भर करता है।
बच्चों को रोजाना बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना और लगातार नजदीक से पढ़ने या स्क्रीन देखने के बीच ब्रेक देना भी उपयोगी आदतें हैं। विशेषज्ञों का जोर इस बात पर है कि केवल स्क्रीन टाइम घटाना ही नहीं, बल्कि बच्चों की पूरी दिनचर्या और आंखों की नियमित निगरानी पर ध्यान देना चाहिए।
चश्मा हटाने के लिए लेजर सर्जरी कब?
डॉ. चौधरी के अनुसार, चश्मे से छुटकारा पाने के लिए लेजर सर्जरी समेत कई विकल्प उपलब्ध हैं, लेकिन हर मरीज इसके लिए उपयुक्त नहीं होता। सर्जरी पर विचार करने से पहले मरीज की उम्र, आंखों के नंबर की स्थिरता, कॉर्निया और आंखों की अन्य जांचों का आकलन किया जाता है।
माइनस 1 से माइनस 8 तक नंबर होने पर भी केवल इसी आधार पर सर्जरी का फैसला नहीं लिया जा सकता।
बच्चों में, खासकर जब आंखों का नंबर लगातार बढ़ रहा हो, चश्मा हटाने की सर्जरी के बजाय मायोपिया की प्रगति को नियंत्रित करना प्राथमिकता होती है। सर्जरी का निर्णय विशेषज्ञ की जांच और मरीज की स्थिति के आधार पर ही किया जाना चाहिए।
मोतियाबिंद, रेटिना और डायबिटीज के इलाज पर भी चर्चा
डॉ. राजीव चौधरी ने बताया कि तीन दिवसीय सम्मेलन में मोतियाबिंद की सर्जरी, आधुनिक इंट्राऑक्युलर लेंस, रेटिना के उपचार और डायबिटीज से आंखों को होने वाले नुकसान पर भी चर्चा हो रही है।
विशेषज्ञों के अनुसार, मरीज की स्थिति के आधार पर रेटिना की बीमारियों में इंजेक्शन और लेजर उपचार का इस्तेमाल किया जाता है। नई तकनीकों का उद्देश्य इलाज को अधिक सटीक बनाना और मरीजों की दृष्टि सुरक्षित रखने में मदद करना है।
सम्मेलन में 17 राष्ट्रीय स्तर के विशेषज्ञ फैकल्टी के रूप में शामिल हुए हैं। इनमें अमेरिका से आए डॉ. राजीव रमन सहित प्रमुख चिकित्सा संस्थानों के विशेषज्ञ शामिल हैं।
युवा और पीजी डॉक्टरों के लिए हैंड्स-ऑन वर्कशॉप और इंस्ट्रक्शन कोर्स आयोजित किए जा रहे हैं। करीब 55 ट्रेड पार्टनर्स भी आधुनिक उपकरणों और तकनीकों की जानकारी दे रहे हैं।
कार्यक्रम का उद्घाटन ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और एम्स के पूर्व निदेशक डॉ. ललित वर्मा के मुख्य आतिथ्य में हुआ।
इस दौरान डॉ. सुधीर श्रीवास्तव, डॉ. श्वेता वालिया, डॉ. आरएस चौधरी, डॉ. मीता जोशी, डॉ. पुरेन्द्र भसीन और डॉ. प्रतीप व्यास सहित अन्य विशेषज्ञ मौजूद रहे। सम्मेलन में ऑल इंडिया ऑप्थैल्मोलॉजिकल सोसायटी की साइंटिफिक कमेटी ने ‘द कटिंग एज: व्हाट्स न्यू इन ऑप्थैल्मोलॉजी’ विषय पर विशेष सिम्पोजियम भी आयोजित किया।
