भिंड जिले में एक ऐसा अनोखा देवी मंदिर है, जहां करीब 1500 साल पुरानी मान्यता आज भी लोगों की अटूट आस्था का केंद्र बनी हुई है। यहां माता की मूल प्रतिमा एक कुंड के भीतर विराजमान है, लेकिन मान्यता है कि आज तक किसी ने उनके चेहरे के दर्शन नहीं किए। श्रद्धाल
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दरअसल, हम बात कर रहे हैं भिंड जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर पहूज नदी के किनारे बीहड़ों के बीच स्थित मिहोनी वाली माता मंदिर की।
मंदिर से जुड़ी मान्यताओं और इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को करीब से जानने के लिए दैनिक भास्कर की टीम मौके पर पहुँची। ग्रामीणों, मंदिर के पुजारियों और श्रद्धालुओं से चर्चा की तो सभी ने एक ही बात कही—कुंड में विराजमान माता की प्रतिमा का चेहरा आज तक किसी ने नहीं देखा और यहाँ सदियों से केवल प्रतिमा की पीठ की ही पूजा होती आ रही है।

मिहोनी माता मंदिर।
चार जिलों की सीमाओं से घिरा है मंदिर; बीहड़ों में डकैत भी नहीं लांघते थे मर्यादा
भौगोलिक दृष्टि से यह मंदिर बेहद खास और संवेदनशील जगह पर स्थित है। यह मंदिर भिंड जिले की सीमा में जरूर आता है, लेकिन मंदिर परिसर से महज आधा किलोमीटर की दूरी पर उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है। इसके अलावा मध्य प्रदेश के दतिया जिले के साथ-साथ उत्तर प्रदेश के जालौन और झांसी जिलों की सीमाएं भी इस क्षेत्र से सटी हुई हैं।
चार जिलों की सीमाओं के मुहाने और पहूज नदी के बीहड़ों में स्थित होने के कारण बीते दौर में यहाँ डकैतों का खासा प्रभाव रहता था। फूलन देवी, मलखान सिंह, लुक्का और 90 के दशक के चर्चित डकैत हरीसिंह कुशवाह जैसे नाम इस क्षेत्र से जुड़े रहे हैं।
स्थानीय निवासियों का कहना है कि डकैतों की आवाजाही बीहड़ के रास्तों से बनी रहती थी, लेकिन वे कभी मंदिर परिसर के भीतर नहीं रुकते थे। डकैत भी माता के प्रति गहरी आस्था रखते थे और रात-विरात पूजा करके चले जाते थे, पर श्रद्धालुओं को कभी परेशान नहीं करते थे।

कुंड के अंदर प्रतिमा के होने के कारण श्रद्धालु बाहर से ही पूजा करते हैं।
गाय की मौत और प्रतिमा का उलटना: 1500 साल पुरानी लोककथा
मंदिर के इतिहास और मान्यताओं को लेकर क्षेत्र में एक कथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाती है। बताया जाता है कि मुगलकाल से भी पूर्व, करीब 1500 साल पहले एक गाय रोज बीहड़ में बने एक चबूतरे पर जाकर पत्थर की प्रतिमा पर अपना सारा दूध अपने आप बहा देती थी।
जब गाय के मालिक को इसका पता चला, तो उसने एक शाम चुपके से गाय का पीछा किया। उसने देखा कि गाय ने पहूज नदी के बीहड़ में बने चबूतरे पर पहुँचकर प्रतिमा पर दूध निकाल दिया है। यह देखकर मालिक आपा खो बैठा और उसने कुल्हाड़ी से गाय पर हमला कर दिया, जिससे गाय की मौके पर ही मौत हो गई।
लोकमान्यता है कि इस घटना के तुरंत बाद माता की प्रतिमा स्वतः ही उलटी हो गई। उस दिन के बाद से प्रतिमा का चेहरा कभी किसी को दिखाई नहीं दिया और श्रद्धालुओं ने प्रतिमा की पीठ की ही पूजा-अर्चना शुरू कर दी।

मिहोनी में माताजी की प्रतिमा कुंड के अंदर है।
कुंड में पानी भरा, अब ऊपर से ही पूजा
पहले श्रद्धालु सीढ़ियों से कुंड में उतरकर माता की मूल प्रतिमा तक पहुंचते और फूल चढ़ाते थे। पिछले कुछ वर्षों से कुंड में पानी भरने के कारण अब ऊपर से ही पूजा की जाती है। करीब 5 साल पहले कुंड के ऊपर एक और प्रतिमा स्थापित की गई। मंदिर परिसर में प्राचीन मां आदिशक्ति शीतला माता की प्रतिमा भी विराजमान है। इस तरह यहां तीन प्रतिमाओं की पूजा होती है।
11 साल खड़े रहकर की माता की साधना
मंदिर के इतिहास में खड़ेश्वरी महाराज की तपस्या का विशेष स्थान है। वर्ष 1990 के आसपास नसरौल वाले महाराज ने यहां शतचंडी यज्ञ कराया और भीलवाड़ा से आए संत को माता की पूजा के लिए यहीं रहने का आदेश दिया। बताया जाता है कि खड़े श्री महाराज ने लगातार 11 साल खड़े रहकर तपस्या की। इसके बाद मंदिर का जीर्णोद्धार कराया और श्रद्धालुओं के लिए धर्मशाला व पानी की व्यवस्था कराई।
स्थानीय मान्यता है कि महाराज की तपस्या के प्रभाव से जमीन से जलधारा फूटी, जो आज भी स्वतः निकलती है। उनके समाधिस्थ होने के बाद उत्तराधिकारी पुरुषोत्तम दास महाराज मंदिर की व्यवस्था संभाल रहे हैं।

गाय की हत्या से गांव उजड़ने की लोकमान्यता
मंदिर से जुड़ी एक अन्य लोककथा के अनुसार, गाय की हत्या करने वाला व्यक्ति एक विशेष समुदाय से संबंधित था। स्थानीय मान्यता है कि इस घटना के बाद संबंधित गांव उजड़ गया। आज भी वहां खंडहर दिखाई देते हैं। मंदिर के महंत के मुताबिक, पिछले कुछ वर्षों में कुछ परिवारों ने वहां बसने की कोशिश की, लेकिन बाद में वे भी चले गए। हालांकि, इस कथा की ऐतिहासिक पुष्टि नहीं हुई है। यह क्षेत्र में पीढ़ियों से चली आ रही लोकमान्यता है।
बीहड़ में डकैतों की आवाजाही, मंदिर की मर्यादा का रखते थे ध्यान
चंबल की सहायक नदी पहूज के बीहड़ों में कभी डकैतों का प्रभाव रहा है। फूलन देवी, मलखान सिंह और लुक्का जैसे कुख्यात डकैतों के नाम इस क्षेत्र से जुड़े रहे हैं। 1990 के दशक में हरीसिंह कुशवाह भी यहां के चर्चित डकैतों में गिना जाता था।
मिहोनी वाली माता मंदिर की भौगोलिक स्थिति भी इसे खास बनाती है। मंदिर भिंड जिले में है, जबकि करीब आधा किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश की सीमा शुरू हो जाती है। दतिया जिले की सीमा भी पास है। उत्तर प्रदेश के जालौन और झांसी जिले का सीमावर्ती क्षेत्र भी आसपास पड़ता है। चार जिलों की सीमाओं के नजदीक और पहूज नदी के बीहड़ों में स्थित होने के कारण यहां कभी डकैतों की आवाजाही बनी रहती थी।
स्थानीय लोगों के अनुसार, डकैत माता के दरबार में पूजा-अर्चना करने आते थे, लेकिन मंदिर परिसर में नहीं रुकते थे। श्रद्धालुओं को भी मंदिर आते-जाते समय परेशान नहीं किया जाता था। लोगों की मान्यता है कि डकैत माता के प्रति श्रद्धा रखते थे और मंदिर की मर्यादा का ध्यान रखते थे।

माताजी के दर्शन करने के लिए पहूज के बीहड़ों से होकर जाना पड़ता है।
80 वर्षीय बुजुर्ग ने सुनाए माता के चमत्कारों के प्रसंग
गांव के 80 वर्षीय रामकिशन केवट बताते हैं कि उन्होंने बचपन से माता से जुड़े कई अद्भुत प्रसंग सुने और देखे हैं। उनके अनुसार, कुंड में विराजमान प्रतिमा साक्षात भगवती का स्वरूप है। माता का स्वरूप विकराल माना जाता है, लेकिन भक्त उन्हें कृपा करने वाली देवी के रूप में पूजते हैं। मंदिर के ऊपर स्थापित शीतला माता के दर्शन के लिए भी श्रद्धालु नियमित रूप से पहुंचते हैं।

चार पीढ़ियों से माता की सेवा कर रहा पुजारी परिवार
मंदिर में चार पीढ़ियों से पूजा-अर्चना कर रहे पंकज शास्त्री के अनुसार, उनके परिवार की पीढ़ियां माता की सेवा करती आ रही हैं। मान्यता है कि यहां जवारे और पालना चढ़ाने तथा मन्नत मांगने से भक्तों की इच्छाएं पूरी होती हैं। इसी आस्था के चलते दूर-दूर से श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं।
पंकज शास्त्री बताते हैं कि करीब 200 साल पहले ग्वालियर के छप्पर वाला परिवार ने मंदिर की पुरानी मढ़ी बनवाई थी। मान्यता के अनुसार, परिवार के एक बेटे की असमय मृत्यु हो गई थी। इसके बाद परिवार ने माता के दरबार में मन्नत मांगी। माना जाता है कि माता की कृपा से बेटा स्वस्थ हो गया। इस घटना के बाद परिवार की मंदिर के प्रति आस्था और गहरी हो गई।
बाद में खड़ेश्वरी महाराज ने मंदिर का जीर्णोद्धार कराया। पंकज शास्त्री के मुताबिक, कुंड वाली माता और मंदिर में विराजमान माता एक ही हैं। दोनों स्थानों पर श्रद्धालुओं की अटूट आस्था है।
